शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

बहारों की मंजिल


तसकीने मुहब्बत को अदावत ही कीजिये।
उल्फत न सही हम से बगावत कीजिये।
लब पर किसी तरह भी तो आए हमारा नाम,
तारीफ़ न करो तो शिकायत ही कीजिये.
-महेश सोनी

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

आरजू ......



आरजू बे दखल है अपनी तो
हर तमन्ना अजल है अपनी तो।
लोग माहिर हैं हक जताने में,
देखादेखी नक़ल है अपनी तो।
ये भी चाहो तो छीन लो हम से,
झोपडी ही महल है अपनी तो।
दर्द को आंसुओं से सींचा है,
सिफऱ् ये ही फसल है अपनी तो।
हम को लिखने का फन नहीं आता,
जि़न्दगी ही गज़़ल है अपनी तो।
-महेश सोनी

रविवार, 1 जून 2008

आस्तीनें ही हमें डसने लगी|

दर्द की बस्ती जहाँ बसने लगी 
उस शहर की जि़ंदगी हंसने लगी 
हाथ तो अपने बुलंदी से परे, 
पर ज़मीं ही पाँवकी धंसने 
लगी सांप में जब से जगी संवेदना, 
आस्तीनें ही हमें डसने लगी 
कौन देगा ऋ ण, ग्रहण के नाम पर, 
चाँदनी जब चाँद को ग्रसने लगी 
एक शव अर्थी से ही चिल्ला पड़ा, 
खोल दो ये रस्सियाँ, कसने लगी 
जि़ंदगी तो है खफा मुझसे 'महेश, 
मौत के भी कम में टसने लगी 
-महेश सोनी भोपाल