Tuesday, November 21, 2017

प्रदर्शनी में दिखाया लौह पुरूष का जीवन समग्र


विज्ञान केन्द्र में 'एक भारत: सरदार पटेल'  प्रदर्शनी ह लोकप्रिय

महेश सोनी

भोपाल। आंचलिक विज्ञान केन्द्र में लगी सरदार वल्लभ भाई पटेल के जीवन समग्र पर आधारित प्रदर्शनी लोगों के बहुत ही संदेशप्रद और ज्ञानवर्धक है। इससे बहुत कुछ सीखने का मिलता है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की एक परियोजना के अंतर्गत, 31 अक्टूबर 2017 को सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर आंचलिक विज्ञान केंद्र भोपाल में 'एक भारत: सरदार पटेल' नामक डिजिटल प्रदर्शनी लगाई गई है। जिसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सरदार पटेल के जीवन वृत को विभिन्न आयामों से दिखाने की कोशिश पूरी तरह से सफल रही है। यह प्रदर्शनी ना सिर्फ भोपाल बल्कि मध्य प्रदेश के सुदूर अंचलों के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों सहित अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचनी चाहिए, ताकि लोग सरदार पटेल के देश हित में मिए गए कार्यों को भलिभांति समझ सकें । इस डिजिटल प्रदर्शनी में भारत के एकीकरण में सरदार पटेल के योगदान के बारे में बताया गया है और इसका निर्माण माननीय प्रधानमंत्री के प्रोत्साहन से हुआ है। गौरतलब है कि इस प्रदर्शनी का उद्घाटन राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, नई दिल्ली में वर्ष 2016 में इसी दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया था जिसकी पहली वर्षगाँठ आंचलिक विज्ञान केंद्र, भोपाल में मनाई जा रही है। उद्घाटन समारोह में मंत्री उमाशंकर गुप्ता के अलावा डॉ. नवीन चंद्रा, महानिदेशक, मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्, प्रबाल रॉय, प्रकल्प समन्वयक, आंचलिक विज्ञान केंद्र, भोपाल आदि उपस्थित थे।

दुर्लभ जानकारी शामिल

यह प्रदर्शनी सरदार पटेल द्वारा एकीकृत एवं लोकतान्त्रिक भारत के निर्माण में किये गए अथक प्रयासों को एक श्रद्धांजलि है। यह प्रदर्शनी सरदार पटेल द्वारा भारत को एकीकृत करने के लिए किये गए वृहद् प्रयासों का सन्देश देती है। इस प्रदर्शनी में कुछ दुर्लभ जानकारियां और सामग्रियां हैं, जिन्हें राष्ट्रीय अभिलेखागार के अभिलेखों से प्राप्त किया गया है। यह प्रदर्शनी राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा निर्मित एवं राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान अहमदाबाद द्वारा डिज़ाइन की गई है। इस प्रदर्शनी में लगभग 50 प्रादर्श एवं20 विभिन्न तरह के संवादात्मक यंत्र हैं ढ्ढ यह प्रदर्शनी दर्शकों को विभिन्न डिजिटल प्रादर्शों से मुखातिब होने का मौका देती है, जो भारत को एकीकृत करने में सरदार पटेल के प्रयासों को समझाते हैं। इस प्रदर्शनी में कई तकनीकों जैसे 3डी फिल्म्स (बिना चश्मे के), होलोग्राफिक प्रोजेक्शन, काइनेटिक प्रोजेक्शन, आक्युलस आधारित आभासी वास्तविकता आदि का प्रयोग किया गया है ढ्ढ अभिलेखों के अंतर्गत राष्ट्र को एकीकृत करने में सरदार पटेल की भूमिका के परिणामस्वरूप भारत संघ में रियासतों को सम्मिलित करने हेतु विभिन्न रियासतों द्वारा हस्ताक्षरित विलय पत्रों को इस प्रदर्शनी में शामिल किया गया है। केंद्र में यह प्रदर्शनी 31 अक्टूबर से 30 नवम्बर 2017 तक आम जनता के लिए उपलब्ध रहेगी। सभी छात्रों एवं लोगों को इस प्रदर्शनी का अवलोकन अवश्य करना चाहिए। 

स्टेचू के साथ फोटो खिंचाने की ललक

आंचलिक विज्ञान संग्रहालय में सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का कक्ष जिसमें वे कुर्सी पर बैठे हुए अपनी सामने फाईल में रखे कागजों को देखकर कुछ इशारा कर रहे हैं। हूबहू उनका स्टेचू सभी के लिए बहुत ही कौतूहल और आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। हर कोई यहां आकर कक्ष के सामने खड़े होकर फोटो खिंचाने की ललक लिए देखा जा सकता है। वाकई यह जगह है ही ऐसी, और फिर सरदार पटेल का आकर्षण हर किसी को अपनी ओर बुला रहा है। हम भी पहुंच गए और एक फोटो खिंचा ली। इसके साथ ही एक जगह एसी भी है जहां आप माइक पर सरदार पटेल जी से प्रश्न पूछ सकते हैं और वे तुरंत आपको उत्तर भी देते हुए दिखाई दे जाएंगे। वाकई काबिले तारीफ है यह प्रदर्शनी।

Thursday, November 16, 2017

'भोपाल आईडोल' में रंजन की गायकी का जलवा

'भोपाल आईडोल' में रंजन की गायकी का जलवा

भोपाल। प्रदेश की राजधानी भोपाल में गायकी का जलवा बिखेरने वालों के लिए अनेक आयोजन किए जा रहे हैं। विगत दिनों आरिफ अकील फैंस क्लब और तनमन आटा की ओर से 'फिल्मी गीत गायन प्रतियोगिा' आयोजित की गई, जिसमें तीन आयुवर्ग के गायकों ने अपने प्रतिभा का प्रदर्शन किया। होटल सीएसएफसी में हुए फस्र्ट राउंड आडिशन में भोपाल के आइडियल स्कूल के छात्र रंजन सोनी ने 15 वर्ष से कम आयुवर्ग में अगले राउंड के लिए सफलता अर्जित की। इसके बाद दूसरे राउंड में भी उन्होंने अपनी जगह बनाने हुए फाइनल में पहुंच कर अपनी गायकी से सुनने वालों को दीवाना बना दिया। गौरतलब है कि रंजन ने कहीं से भी गाने की तालीम नहीं ली है, उन्होंने एक से बढ़कर एक गीतों को गाकर निर्णायकों को कौतूहल में डाल दिया। शौकिया गायकी को लोगों के सामने लाने के लिए आरिफ अकील फेंस क्लब और तनमन आटा द्वारा सार्थक प्रयास किया गया।

Saturday, November 11, 2017

अपने भीतर कलादृष्टि विकसित करें कला पत्रकार : राजीव वर्मा

अपने भीतर कलादृष्टि विकसित करें कला पत्रकार: राजीव वर्मा 

सप्रे संग्रहालय में लोक संवाद के तहत कला-पत्रकारिता पर कार्यशाला का आयोजन

महेश सोनी                                                                                                                                             भोपाल। कला पत्रकारिता आसान काम नहीं है। कला-संस्कृति की रिपोर्टिंग से जुड़े लोगों के लिए जरूरी है कि वे अपने भीतर कलादृष्टि विकसित करें। आज कला गतिविधियों से जुड़े समाचारों को मीडिया में जगह तो बहुत मिल रही है लेकिन इनमें कथ्य का अभाव है। कुछ इस तरह के विचार शनिवार को सप्रे संग्रहालय के सभागार में सुनाई दिए। मौका था  कला पत्रकारिता पर आयोजित कार्यशाला का। इस कार्यशाला का आयोजन संग्रहालय द्वारा प्रतिमाह आयोजित की जाने वाली श्रंखला लोक संवाद के तहत किया गया था।

संग्रहालय की परंपरानुसार इसमें विषय विशेषज्ञों के सूत्र उद्बोधन के बाद उपस्थित प्रतिभागियों तथा विशेषज्ञों के बीच आपसी संवाद भी हुआ। वक्तव्यों की शुरुआत करते हुए सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और रंगकर्मी राजीव वर्मा ने इस बात की सराहना तो की कि आज समाचार पत्रों में कला की खबरों को व्यापक स्थान मिल रहा है लेकिन यह समीक्षा न होकर सिर्फ रिपोर्टिंग ही रह गई है। उन्होंने अन्य विषयों की तरह ही कला की खबरों को भी विस्तार और सम्मान जनक जगह दिए जाने की आवश्यकता बताई। लोक कला मर्मज्ञ बसंत निरगुणे ने कहा कि खबरों में उस कला या विधा से जुड़ी बातें नहीं आ पाती। इसके पीछे पत्रकारों की कला के प्रति समझ का अभाव होना एक बड़ा कारण है। उन्होंने पत्रकारों को सलाह दी कि वे कला के प्रतिदृष्टि विकसित करें। सुप्रसिद्ध सिरेमिक कलाकार देवीलाल पाटीदार का कहना था कि खबरें स्थानीयता से आगे बढ़ें। साथ ही उन्होंने पत्रकारों को सुझाव दिया कि खाली समय में वे कलाकारों के पास जाकर उनकी कार्यशैली को समझें। 
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संपादक भी रूचि दिखाएं: मिश्र
कार्यक्रम में फिल्म समीक्षक सुनील मिश्रा ने कहा कि कला  पत्रकारों में तन्मयता की कमी नहीं है लेकिन यदि संपादक भी उस रुचि का मिल जाये तो उसकी खबरें और निखर जाती हैं। रंगकर्मी विवेक मृदुल का मानना था कि आज तकनीकी संसाधन विकसित हो जाने से पत्रकार बैठे-बैठे ही जानकारी पाना चाहता है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने कला की खबरों सही स्थान न मिलने के लिए प्रबंधन की रुचि को भी जिम्मेदार बताया। सुप्रसिद्ध कला पत्रकार और समीक्षक विनय उपाध्याय ने कहा कि कला की पत्रकारिता में लगे लोग इसे  नौकरी न समझकर इसमें व्यक्तिगत् रुचि लें। उन्होंने भाषा विकसित करने की सलाह भी नए पत्रकारों को दी। साहित्यकार डॉ. रामवल्लभ आचार्य ने कहा कि पत्रकारों के सामने समस्यायें हो सकती हैं लेकिन इसके रास्ते भी निकालने होंगे। साहित्यकार एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजीव शर्मा ने कहा कि आज कला पत्रकारिता का विस्तार हुआ है। उन्होंने कला से जुड़ी विभिन्न विधाओं के विषयों पर अलग-अलग  ऐसी ही कार्यशालाएं आयोजित की जाने की जरूरत बताई। फिल्म समीक्षक विनोद नागर ने फिल्म समीक्षा के गुर बड़ी बारीकी से बताये। साहित्यकार एवं पत्रकार युगेश शर्मा ने भी विषयवार कार्यशाला आयोजित कर इस पहल को आगे बढ़ाने का सुझाव दिया। 
पुराने पत्रकार करें नई पीढ़ी को तैयार: मनवानी
साहित्यकार अशोक मनवानी ने पुराने पत्रकारों को नई पीढ़ी के पत्रकार तैयार करने का सुझाव दिया। वरिष्ठ पत्रकार राकेश दुबे ने कहा कि आज इन विषयों की समझ बढ़ी है। हालांकि उन्होंने कला से जुड़ी रंगसंधान जैसी पत्रिकाओं के बंद होने की घटना पर दु:ख भी जताया। प्रतिभागी के रूप में बोलते हुए पत्रकार राजेश गाबा ने कहा कि आज के पत्रकारों के सामने भी पहले की तरह ही चुनौतियां हैं। इसमें समय और जगह का अभाव प्रमुख है। इस तरह की कार्यशालाएं इन समस्याओं का रास्ता निकाल सकती हैं। विकास वर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुछ कलाकार  सिर्फ अच्छा ही सुनना चाहते हैं। इस प्रवृत्ति पर भी रोक लगनी चाहिए। साहित्यकार वंदना दवे ने परिवार में ही कला संस्कार विकसित करने पर जोर देने की जरूरत बताई। विषय पर सुनील चौधरी, मधुरिमा राजपाल तथा हिमांशु सोनी ने भी विचार रखे।  कार्यशाला का संयोजन एवं संचालन दीपक पगारे ने किया था। वर्कशॉप में पत्रकारों के अलावा बड़ी संख्या में साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोग मौजूद रहे। 

Monday, October 30, 2017

संकल्प से सिद्धी: किसानों की आय दुगनी

प्रदेश के किसानों के लिए वरदान है जैविक खेती। यदि हमारे प्रदेश के किसानों की आय को दुगनी करनी है तो इसके लिए लागत में कमी लानी होगी, नुकसान को कम करना होगी और जैविक खेती को अपनाना होगा। यही संकल्प से सिद्धी है। 

Sunday, October 29, 2017

रामलीला का चलन कम होगया लेकिन उसी को लेकर इस समाचार में रामलीला महोत्सव का जिक्र किय गया है।

रामलीला का चलन कम होगया लेकिन उसी को लेकर इस समाचार में रामलीला महोत्सव का जिक्र किय गया है।

Monday, April 17, 2017

महेश सोनी को महात्मा ज्योतिबा फुले-2016 सम्मान सम्मान

महेश सोनी को महात्मा ज्योतिबा फुले-2016 सम्मान सम्मान

भोपाल। सहकारिता राज्य मंत्री मप्र शासन, विश्वास सारंग ने 16 अप्रैल 2016 रविवार को भोपाल स्थित रविन्द्र भवन में आयोजित महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रबाई फुले सम्मान से समाज कार्यों के लिए 16 कर्मशीलों को सम्माति किया। समाजिक उत्थान में अपना योगदान देकर पिछड़े, जरूरतमंदों और बेसहारा लोगों को समाज की नई धारा से जोडऩे का काम व्यवहारिक तथा वैचारिक स्तर पर करने वाले अलग अलग क्षेत्रों के सोलह लोग शामिल हैं। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार, आकशवाणी, दूरदर्शन के एंकर, साहित्यकार महेश सोनी को उत्कृष्ट लेखन तथा समाज सेवा के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले-2016 सम्मान दिया गया।

Tuesday, April 4, 2017

फिल्म जगत के मशहूर अदाकार रज़ा मुराद साहेब से गुफ्तगू करते हुए अखबार नबीस महेश सोनी। नई फल्मों में गीतों पर काफी गहरी चर्चा हुई।

Monday, March 27, 2017

जंगल है तो नदी, जल है तो समुदाय

विश्व जल दिवस: 22 मार्च

जंगल है तो नदी, जल है तो समुदाय

-महेश सोनी



प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है जल। पारिस्थितिकी तंत्र की अवधारणा को समझें तो जंगलों की उपलब्धता पर ही नदियों का अस्तित्व है और नदियों का अस्तित्व है तो ही धरती पर जल है। यहां तक तो ठीक है लेकिन समुदाय अर्थात मुनष्य के जीवित रहने की ल्पना करें तो जल के बिना संभव नहीं है। आज पर्यावरणीय आवश्यकताओं को देखें तो हमारा पर्यावरण विखंडित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ऋतुओं के क्रम में भी काफी बदलाव आ गया है। बेमौसम बारिश, सर्दी का सिमटना, गर्मी का लंबा अंतराल ये सब हमारे सामने बड़ी चुनौतियां हैं। पिछले दो दशक को ही ले लें, तो देखने में आया है कि जहां नदियों ने अपना स्वरूप बदला है वहीं जल की उपलब्धता में कमी आई है। इसकी खास वजह जंगलों का बेतहाशा शोषण, अवैध कटाई और शहरीकरण है। आज शहरों में कांक्रीटीकरण के फलस्वरूप बरसात का पानी बह निकलता है। जबकि कच्ची मिट्टी उसे सोख लेती है। यही वजह है कि जमीन की जलधारण क्षमता में कमी आई है। इसका परिणाम हम दो दशकों के अंतराल में ही देख चुके हैं कि जमीन का जल स्तर काफी नीचे चला गया है। अब हालांकि कुछ सालों से इसे वापस लाने के लिए लोग जागरूक हुए हैं और नदियों, कछारों, तालाबों, कुंओं, बावडिय़ों की सफसफाई के प्रति सकारात्मक व्यवहार दिखा रहे हैं। प्रकृति लंबे अंतराल में करबट बदलती है, जो एक पीढ़ी तो उसे समझ ही नहीं पाती है, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें और पुराने धरोहरों को देखें तो हम समझ सकते हैं कि पुराने समय में जल की उपलब्धता कितनी अधिक थी। नदियों में बारहमासी जल बहता था, कुंओं में सालभर पानी खत्म नहीं होता था, तालाबों में हर मौसम में नौका विहार किया जाता था, और बावडिय़ों में गरमी के मौसम में शीतल जल की उपलब्धता उस तपिश को कम करती थी, जब सूर्य प्रचंड तेज बरसाता था। 

मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में रोटी कपड़ा और मकान से पहले अब हमें जल को जोडऩा चाहिए। क्योंकि हम इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि आने वाले दस सालों में देश की सत्तर फीसदी आबादी अब शहरों में निवास करेगी। गांवों का नगरीकरण बड़ी तेजी से हो रहा है, और नगर अब शहर बनते जा रहे हैं। गांवों में लोग वहां भी कांक्रीटीकरण करने से परहेज नहीं कर रहे हैं। ऐसे में इतनी बड़ी आबादी को जल मुहैया कराना सबसे बड़ी चुनौती होगी। भारत सरकार, नीति आयोग के 'सतत विकास लक्ष्य-2030Ó के 13 लक्ष्य इसी चिंता में डूबे हुए हैं जबकि लक्ष्य क्रमांत तीन में सभी के लिए पेयजल तथा स्वच्छता, लक्ष्य क्रमांक 13 में जलवायु परिवर्तन का अध्ययन, लक्ष्य क्रमांक 14 में जल स्त्रोंतों का रखरखाव, भूमि कटाव को रोकना, नदियों का संरक्षण, जैव विविधता की हानि को रोकना प्रमुख रूप से रखा गया है। सिंहस्थ-2016 के वैचारिक महाकुंभ के विचार अमृत में भी इस चिंता को प्रमुख रूप से सामने लाया गया है कि हमें जल संरक्षण तथा संवर्धन की चिंता करनी है। अब वह समय आ गया है जब हमें वैचारिक चिंता की बजाय व्यावहारिक चिंता करनी होगी। प्रकृत्ति प्रदत्त अमूल्य उपहारों को नि:शुल्क मानने की बजाय कीमती मानना होगा। जल स्त्रोतों को हमें अपने हाथों से स्वच्छ, साफ रखना होग, विकृत होने पर अपने हाथों से साफ-सफाई करने का बीड़ा उठाना होगा। अन्यथा दस साल बाद हमें पानी के लिए लंबी कतारें लगानी होगी और जब हमारी बारी आएगी, तब तक जल का बरतन खाली हो चुका होगा। 

जल बचाने के लिए जंगलों को सहेजना आवश्यक है। इसके लिए नदियों को संरक्षित करना भी बेहद जरूरी है, तभी हमारा समुदाय या मनुष्य समाज सुरक्षित होगा। आज नर्मदा नदी को सहेजने, उसे प्रदूषण से मुक्त करने के लिए 'नमामि देवी नर्मदे-सेवा यात्राÓ चलाई जा रही है। यह यात्रा किसी धर्म, पंथ, संप्रदाय, या वर्ग विशेष से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह तो मानव मात्र के कल्याण के लिए है। नर्मदा या अन्य तमाम नदियां आस्था और विश्वास का प्रतीक इसलिए भी है क्योंकि जल हम सब की आवश्यकता है। इसमें कोई धर्म, पंथ या संप्रदाय आड़े नहीं आता। यही वजह है कि विगत 11 दिसंबर 2016 से नर्मदा उद्गम स्थल अकरकंटक से यह यात्रा शुरू हुई और प्रदेश के नर्मदा तटों के 14 जिलों के जन समुदाय को साथ में लेकर 11 जून 2017 को समाप्त होगी। यह यात्रा केवल यात्रा नहीं है, बल्कि यह लोगों को नदियों, जल संरक्षण और जंगलों को सहेजने के लिए एक जनजागरुका यात्रा है। इसमें सभी धर्म, पंथ और समुदायों ने बढ़चढ़ कर अपनी हिस्सेदारी की है। इसी तरह देश की अन्य नदियों के लिए भी संरक्षण अभियान चलाया जा सकता है, ताकि गांवों की 70 फीसदी आबादी जब शहरों में तब्दील हो रही है तो उसे स्वच्छ जल मिल सकेगा। 

वर्तमान में जल, जंगल, नदी बचाने, इन्हें संरक्षित करने के लिए सरकारी स्तर पर अनेक योजनाएं चलाई जा रही हंै, अनेक प्रयास हो रहे हैं। लेकिन क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं? प्रयास पर्याप्त भले ही न हों, लेकिन जो सरकार की चिंता है, उसको हमें अपनी चिंता बनानी चाहिए। क्योंकि राजा प्रजा को परेशानी से मुक्त करने की योजना बना सकता है, संसाधन मुहैया करा सकता है, लेकिन प्रजा को या जनता को संसाधनों का सही उपयोग करना जरूरी है, अन्यथा संसाधन भी समाप्त हो जाएंगे और समस्या भी बनी रहेगी। आज हम पानी खरीद कर पीने लगे हैं, बीस साल पहले कोई कहता था, कि पानी बेचो तो यह मजाक लगता था, लेकिन यह आज की जरूरत बन गई है। हम इसके आदी होते जा रहे हैं, लेकिन जहां से जल का उद्गम है, उन जंगलों को नदियों को बचाने उन्हें संरिक्षत करने की ओर हमारा ध्यान नहीं जा रहा है। हालांकि जानकारों का कहना है कि गांवों में गा्रमीणों में इसकी ललक आज भी है और वहां प्रकृति प्रदत्त उपहारों की पूजा भी की जाती है, लेकिन शहरी आबादी का ध्यान इस ओर बिलकुल भी नहीं जा रहा है, यही वजह है कि शहरीकरण के चलते पेय जल की उपलब्धता में कमी आई है। अब शहरी आबादी को अपना ध्यान इस ओर ले जाना है, तभी हमारा विश्व जल दिवस मनाना सार्थक होगा, नहीं तो आने वाले दिनों में बहुत बड़ी मुश्किल हमारे सामने होगी।

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Wednesday, March 22, 2017

निबंध प्रतियोगिता में महेश सोनी प्रथम

निबंध प्रतियोगिता में महेश सोनी प्रथम

वन मंत्री डॉ. शेजवार ने बाँटे राज्य स्तरीय जैव विविधिता प्रतियोगिताओं के पुरस्कार 
विश्व वानिकी दिवस पर मप्र वन विभाग, जैव विविधता बोर्ड के तत्वावधान में 21 मार्च 2017 को नरोन्हा प्रशासन अकादमी में आयोजित जल-वन-नर्मदा-भोपाल जन-जागरूकता अभियान में हुई चित्रकला, निबंध और फोटोग्राफी प्रतियोगिता के विजेताओं को वन मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार ने पुरस्कृत किया। निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार पत्रकार व आकाशवाणी, दूरदर्शन के एंकर महेश सोनी 15 हजार रुपए, द्वितीय पुरस्कार कुमारी नीतू दोशी को 10 हजार और तृतीया पुरस्कार राजाराम रावते को पांच हजार रुपए व प्रशस्ति पत्र दिया गया। 

Saturday, February 25, 2017

'मिल-बांचें'मप्र में शासकी विद्यालय गुनगा में पहुंचकर बच्चों के साथ पठन-पाठन के साथ ही पढ़ाई की गुणवत्ता और शिक्षा सुविधाओं की चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार महेश सोनी, पूर्व जनपद सदस्य मनोज वशिष्ठ, प्राचार्य, प्रधानाचार्य।